काफी समय बाद आने की सोचते हुए एक भी नयी बात सामने नहीं आ पायी है.
अब फिर इन्तजार है।किसी नयी बात के आने का।
शायद यह अवरोध रचनात्मक बेचैनी के उछाल मारने की जमीन तैयार कर रहा हो?
सोमवार, मार्च 01, 2010
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फ़ुर्सत की बातों का लेखा-जोखा